Samrat Ashoka

सम्राट अशोक कौन था ? कब और किसके साथ हुआ था कलिंग युद्ध ? मेरी समझ से काफी भ्रांतियाँ हैँ उसके सम्बन्ध में ।
उसे बौद्ध सम्राट कहा जा रहा है , जबकि उसे बौद्ध सिद्ध करने वाले कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैँ ।
उसे चंड अशोक कहा गया है और चंद का अर्थ चाण्डाल किया जाता है । यह अर्थ काल्पनिक है । क्योँ नहीं इसे चंद्र का अपभ्रंश माना जाए ?
पुनः कलिंग युद्ध के बाद शोकग्रस्त हो चुके सम्राट को अशोक कहने का क्या औचित्य है ?
इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की सत्ता आसाम से अफ़ग़ानिस्तान तक थी । फिर उड़ीसा को अलग मानने का क्या औचित्य है ? कौन था उड़ीसा का सम्राट ?
मेरी समझ से इतिहासकारों ने अशोक का सही मूल्यांकन नहीं किया है । अशोक कोई नाम नहीं था , निकनेम हो सकता है और निकनेम भी अशोक नहीं अशाक्य होगा जिसका अर्थ था ‘ बौद्धों का विरोधी ‘ ।
वह मौर्य था यानि मयूर तंत्र का पुरोधा था और बौद्धों का विरोधी थ और अशाक्य कहलाता था । वह गंगा का स्वामी था और गंगपति>गणपति कहलाता था । वह बाभन था जिससे द्वि इन्द्र >देवेंद्र कहा जाता था । इन्द्र शब्द आंग्ल earth का भारतीय रूप है ।
बाभन शब्द द्वि भू वान् का अपभ्रंश है । इसी का पर्याय द्वि इन्द्र >देवेंद्र , द्वि मही वार >भूमिहार , द्विज्य (द्वि +ज्या ) >द्विज , ज्या -द्वय >जादव है ।
बाभनों के शीतकालीन आवास को कं-स्थल >कं-थर >कंत्र >गोत्र या पारावार आश्रय >पाराशर और ग्रीष्मकालीन आवास को

भारत में राजतंत्र नहीं था , इसलिए यहाँ राजा की जगह मौर्य शब्द प्रचलन में था । मौर्य ने भूपति यानि भू -स्वामित्व अपने पास रखते थे , ताकि अन्न का सम्यक् वितरण किया जा सके और कोई भूखा न रहे । भूपति को गोपति या गोपाल भी कहा जाता था । गुप्त शब्द गोपति का भी अपभ्रंश है । ।
मौर्य भू -स्वामी थे , लेकिन जमीन से उत्पन्न अन्न पर सारे लोगों का अधिकार माना जाता था । अन्य व्यवसाय के लोगों के अन्न की आवश्यकताओं की पूर्त्ति का दायित्व मौर्य का ही होता था । बाजार का जन्म नहीं हुआ था । अन्न का चिरकालिक भंडारण सम्भव नहीं था ।
चन्द्रगुप्त शब्द अनेकार्थक था । इसकी मुख्य दो व्युत्पत्तियाँ स्पष्ट हैँ -चंद्रगु-पति और चार्टर ऑफ़ स्क्रिप्ट (charter of script ) । चन्द्रगु का अर्थ है चंद्रमा की तरह पश्चिम से पूर्व गमन करने वाला । इससे गंगा और भू दोनों का बोध होता था । गंगा भी पश्चिम से पूर्व बहती है । भारतीयों को मालूम था कि धरती भी पश्चिम से पूर्व ही घूमती है । इसतरह भू और गंगा दोनों के लिए चन्द्रगु शब्द का प्रयोग होता था तथा चन्द्रगुप्त का अर्थ भूपति और गंगपति दोनों था ।
साहित्य की भारतीय शैली, जिसमें एक ही शब्द के व्युत्पत्ति के आधार पर अलग -अलग अर्थ स्वीकृत थे , अब मृतप्राय हो चुकी है जिससे प्राचीन काव्यों के सही अर्थ हम नहीं कर पाते हैँ ।
नामैकदेशेन ग्रहणम् न्यायः एक लोकप्रिय सूत्र था जिसके अन्तर्गत लंबे शब्दों के खण्ड -रूप ही प्रचलन में रखे जाते थे । इसीलिए चन्द्रगुप्त की जगह सिर्फ चंद्र प्रयुक्त होने लगा था ।
मौर्य चन्द्रगुप्त को ही ग्रीकों ने peacock Hidden Moon कहा था जो आज कपि हनुमान बन गया है । शीतकालीन आवास को Ice earth और ग्रीष्मकालीन आवास को sea coast कहा जाता था । भारत में आइस की जगह शिव , अर्थ की जगह इन्द्र और सी -कोस्ट की जगह कोट्टस शब्द विकसित हुआ । इसतरह शिवेंद्र कोट्टस >साण्ड्रोकोट्टस नाम प्रकट हुआ ।
मौर्य चंद्र का ही अपभ्रंश रामचंद्र है । इसतरह रामचंद्र शब्द भी चन्द्रगुप्त का ही पर्याय है ।
आज चन्द्रगुप्त को रामचंद्र मानने में लोगों को लज्जा आ रही है, पर उससे बड़ा साम्राज्य आजतक भारत में किसी का नहीं हुआ है । वही देवेंद्र था , वही रामचन्द्र था , वही कृष्णचंद्र था , वही शिवेंद्र था , वही विक्रमादित्य था , वही हरिश्चन्द्र था , वही श्रृंगी ऋषि था । उसकी राजधानी अमरपदी , अमरावती , आम्रपाली , अवध्यापुरी >अयोध्यापुरी कहलाती थी ।
अशाक्य चंद्र श्रृंगी था यानि श्रृंग (शिखा ) धारण करने वाला यानि शिखी (मयूर , मौर्य ) था ।
मौर्य चंद्र को ही रामचंद्र कहा जाता था
जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के अभिलेख को पढ़ने में कहीं कहीं भूल कर दी थी , जैसे मूल पाठ ‘ पति देवसरि ‘ था पर उसने ‘ पियदस्सी ‘ पढ़ लिया था । हमारे भारतीय इतिहासकार अंधानुकरण में अग्रणी हैँ । किसी ने भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया जबकि पियदस्सी सुनने में ही अनर्गल प्रतीत होता है । इसीतरह देवानाम् पिय पाठ भी गलत है । शुद्ध संस्कृत देव और अपभ्रंश ‘ पिय ‘ का योग बेमेल है । वहाँ पति को पिय और देववन्या या देव -वन्यम् को ‘ देवानाम् ‘ पढ़ने की भूल की गयी है ॥ मूल पाठ देव-वन्या पति है ।गंगा को ही देव -वन्या कहते थे ।
पति देवसरि और देववन्या -पति का अर्थ है ‘ गंगा का स्वामी ‘ । ‘ गंगा के स्वामी ‘ के लिए ही चंद्रगु -पति अभिधान प्रयुक्त हुआ था जो चन्द्रगुप्त में बदल गया था । इसतरह जिन्हें हम अशोक समझ रहे हैँ , वे सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य थे । उन्हें ही पर्शिया अमित्र (यानि पर्शिया का शत्रु ) >पुष्यमित्र कहा जाता था । उन्हें ही श्रृंगधर , श्रृंगी >शुंग , शिखी , मौर्य कहा जाता था ।
पुष्यमित्र शुंग बाभन था और बौद्धों का शत्रु था । बौद्धों को ही ब्राह्मण कहा जाता था । अब बाभन को ब्राह्मण समझकर पुष्यमित्र को ब्राह्मण समझने की भूल की जा रही है । बौद्धों का शत्रु भला ब्राह्मणों का मित्र कैसे हो सकता है ?
चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने पूर्व के बर्हि- राटों यानि मौर्य सम्राटों के आदेशों का संकलन करवाया था और उसे ‘ बर्हि -राट अर्थवेद ‘ नाम दिया था । अब इसे ‘ बृहद्रथ वध ‘ बनाकर हत्या की काल्पनिक कहानी गढ़ी जा रही है और मौर्य -वंश के अंत की घोषणा की जा रही है ।
सच यह है कि मौर्य -परम्परा में सबसे बड़ा पद सेना पति का ही होता था । वही महामात्य (महा अमर्त्य ) और महादेव कहा जाता था । महादेव ही गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते थे । वे गणपति थे , गणेश थे । राजतंत्र नहीं था भारत में । इस तंत्र को हम रोम के इतिहास से समझ सकते हैँ , जहाँ राजा नहीं सीनेट की सत्ता होती थी । भारत में सीनेट को ही नासत्य कहा जाता था ।
इसतरह पुष्यमित्र शुंग नामक सेनापति द्वारा बृहद्रथ नामक सम्राट की हत्या कर दी गयी थी -यह कहानी गलत है , क्योंकि यह मौर्य -परम्परा से मेल नहीं खाती है । वस्तुतः वेद को वध बनाकर मिथक गढ़ा गया है ।
वेद को वध बनाकर अनेक काल्पनिक कहानियाँ गढ़ी गयी हैँ । रामायण में तर्क वेद को ताड़का-वध , सहस्रविधु वेद को सहस्रबाहु वध ,शम्बूक ( चुम्बक) -वेद को शम्बूक -वध बना दिया गया है । रामचंद्र तर्क- का अध्ययन करने सिद्धाश्रम गए थे , परशुराम सहस्रविधु वेद का ज्ञाता था । चुम्बक वेद को शूद्र वेद कहा जाता था क्योंकि इसके ज्ञाता उष्ट्र देश के निवासी थे । शूद्र शब्द उष्ट्र का अपभ्रंश है । उष्ट्र देश के रूप में ईरान लोकप्रिय था ।
दो चंद्रग्रहणों का अंतराल सहस्रविधु कहलाता था और इसका कालमान 18 वर्ष 11दिन 8घंटे होता है । अंग्रेजी में सहस्र को सरोस(saros ) कहते हैँ ।
परशुराम ने सहस्रबाहु वध नहीं किया था , उसने सहस्रविधु वेद की नींव डाली थी । वैसे , इतिहास में मान्यता है कि ग्रहणों की भविष्यवाणी बेबीलोन में शुरू हुई थी । पर्शिया के राम (राजा ) ने यह ज्ञान बेबीलोन से ही हासिल की थी ।
ग्रहणों की भविष्यवाणी की तकनीक ने ही ब्राह्मणों (बौद्धों ) को भारत में प्रतिष्ठा दिलवायी थी ।

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