याचक एवं अयाचक ब्राह्मण

आर्यों की श्रुति, स्मृति, पुरणादि, संस्कृत ग्रन्थों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सर्व प्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उनके द्वारा जो प्रथम प्रजा उत्पन्न हुई वह ब्राह्मण कही गई। इसके पश्चात जैसे जैसे मनुष्यों की आबादी बढ़ती गई, उनके गुण ओर कर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र ये चार जाती भेद, या वर्ण बने।

ब्राह्मण प्रारम्भ में हिमालय क्षेत्र के उत्तरी भाग में बसे, फिर क्रमश: भारत भूमि के उत्तर हिमालय की तलहटी, सिंधु, व गंगा के मैदान, ब्रह्मावर्त में शरावती (सरस्वती) नदी के किनारे बसे। अन्य समस्त उत्तर भारतीय ब्राह्मण कालांतर में विस्तार पाकर अपने अपने निवास क्षेर्त्रो , जैसे कान्यकुब्ज, सरूयूपारीय, पुष्करणा, आदि-आदि कहे जाने लगे।

पाणिनी मुनि ने अपने “सिद्धांत कौमुदी” व्याकरण रचना में उस काल में “अयाचकता” एवं “याचक ” केवल दो विभाग ही बताएं हें। उनके इस व्याकरण ग्रंथ से ज्ञात होता है, अयाचकता याचक की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ थे।

धर्म ग्रंथों में दो प्रकार के ब्राह्मणों का उल्लेख है:–(1) याचक (2) अयाचक

याचक अर्थात भिक्षा मांगने वाला, दान लेने वाला। इस कर्म को कभी श्रेष्ठ नहीं माना गया ।
जो ब्राह्मण घर घर जाकर पूजा पाठ कराते हैं। दान लेते हैं वे इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसे ब्राह्मणों कीआजीविका पुरोहिताई से होती है।

महर्षि वशिष्ठ ने रामचरित मानस में कहा है:– पौरोहित्य कर्म अति मंदा।

अयाचक ब्राह्मण:– जिन्होंने पुरोहिताई को अपनी आजीविका का साधन नहीं बनाया, जिनकीअजीविका का साधन कृषि, जमींदारी, राज पाट आदि थे।

परंतु दोनों ही प्रकार के ब्राह्मणों में आजीविका छोड़ कर अन्य सभी बातों में समानता थी।
साधना, स्वाध्याय, अध्ययन, अध्यापन तपश्चर्या आदि।

1037 ब्राह्मणों को पाटन के महाराज मूलराज सोलंकी ने ऋषि कोडिन्य के परामर्श से अपने पाप के प्रायश्चित करने हेतु गुजरात आमंत्रित किया था। इन एक हजार सेंतीस विद्वान ब्राह्मणो को विधि और यज्ञादी के पश्चात पूजन कर आभूषण वस्त्र, भूमि, भवन स्वर्णादी दान देना, चाहा था। शास्त्रों के अनुसार धन लेना, अनुचित माना जाता था। अत: इसे सभी ने अस्वीकार कर दिया- राजा चिंतित हो गया, क्योंकि यज्ञादी का पूर्ण फल प्राप्त करने दान दिया जाना आवश्यक था। ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण अयाचक ब्राह्मण कहे गए।

अयाचक राज्य के शासकीय, नैतिक, धार्मिक व न्यायिक क्षैत्रों में शासक का सर्वोच्च सलाहकार था। यहाॅ तक ही नहीं आवश्यकता पडने पर अयाचक ने सैन्य संचालन भी बहुत ही बहादुरी व कुशलतापूर्वक किया। इस प्रकार यह जाति हमेशा जन्म से ब्राह्मण व कर्म से क्षत्रिय रही। शासकों द्वारा अयाचक को इनके शौर्य एवं वीरता के फलस्वरूप कई जागीरें बख्शी गई व कई तरह के सम्मान भी दिये गये। अयाचकर को अपने नाम के आगे ठाकुर व नाम के पीछे सिंह लगाने का भी अधिकार था एवं जागीरदार कहलाते है।

सत्ययुग से ही अयाचक्त्व की प्रधानता रही| विभिन्न पुराणों, बाल्मीकिरामायण और महाभारत आदि में आये सन्दर्भों से पता चलता है कि याचकता पर सदा अयाचकता की श्रेष्टता रही है|

आईन-ए-अकबरी, उसके अनुवादकों और उसके आधार पर इतिहास लेखकों के भी मत से भूमिहार/त्यागी ब्राह्मण लोग कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले ब्राह्मण हैं। कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले भूमिहारों के लिए ‘जुन्नारदार’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब होता है “जनेऊ पहनने वाला ब्राह्मण”

Kamlendra Priyadarshi - Bhumiharworld.com

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1 comment on “याचक एवं अयाचक ब्राह्मण”

  1. Chandramohan Shivkumar Singh

    Very nice knowledge are given in the title of yachak and ayachak Brahmin.I like it.

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