ब्रह्मर्षि समाज

रूद्रमहालय’ मंदीर अयाचक ब्रह्मणों की पहचान और शानका प्रतिक हैं, रूद्रदेव या महादेव अयाचक ब्राह्मणों का ईष्ठदेवता हैं ।

सहस्र औदिच्य ब्राह्मण (अयाचक ब्राह्मण/ब्रह्मर्षि समाज ) अधिकांशतय: गुजरात राज्य में निवास करते हें| सहस्र औदिच्य ब्राह्मण के रूप में मूल इतिहास वर्ष 950 ई. के आसपास से पाया जाता हे| मूलराज सोलंकी ने 1037 ब्राह्मण परिवारों को आमंत्रित किया, 1037 ब्राह्मण परिवारों के एक बड़ा कारवां सिद्धपुर पाटन पहुंच गया। उन्होंने राजा मूलराज और उसके लोगों के द्वारा सम्मानित और भूमि दान कर स्थापित किया। उन दिनों में ब्राह्मणों अपने प्रवास या मूल के स्थान के द्वारा जाना जाता था। उत्तर दिशा से आने के और अतीत के विभिन्न गोत्रो से मिलकर ब्राह्मणों के इस बड़े समूह को आधिकारिक तौर पर सहस्त्र औदिच्य ब्राह्मण नामित किया गया था। क्योकि संस्कृत में, औदिच्य का अर्थ उत्तरी दिशा से है। इस तरह से गोत्र मूल ही रहा और स्थान राजा मूलराज सोलंकी द्वारा प्रदत्त, श्री स्थल, जो कालांतर में सिद्धपुर पाटन के रूप में जाना जाता है।

इस प्रकार गोत्रके नाम और संख्या, परिवारों के उनके मूल स्थान पर बसने के अनुसार हुई।

जमदग्नि, वत्सस, भार्गव (भृगु), द्रोण, दालभ्य, मंडव्य, मौनाश, गंगायण, शंकृति, पौलात्स्य, वशिष्ठ, उपमन्यु, 100 च्यवन आश्रम, कुल उद्वाहक, पाराशर, लौध्क्षी, कश्यप: नदियों गंगा एवं यमुना सिहोरे और सिद्धपुर क्षेत्रों से 105 विमान, 100 सरयू नदी दो भारद्वाज कौडिन्य, गर्ग, विश्वामित्र, 100 कान्यकुब्ज सौ कौशिक, इन्द्रकौशिक, शंताताप, अत्री, 100 हरिद्वार क्षेत्र और औदालक, क्रुश्नात्री, श्वेतात्री, चंद्रत्री 100 नेमिषाराण्य, अत्रिकाषिक सत्तर, गौतम, औताथ्य, कृत्सस, आंगिराश, 200 विमानों कुरुक्षेत्र चार शांडिल्य, गौभिल, पिप्लाद, अगत्स्य, 132 सिद्धपुर पाटन पर पहुंचने पर औदिच्यों में पुष्कर क्षेत्र (अगत्स्य, महेंद्र) के गांव।।

ब्रह्मर्षि समाज (अयाचक ब्राह्मण) जोकि कालान्तर में त्यागी, भूमिहार, महियाल, गालव, चितपावन, नम्बूदरीपाद, नियोगी, अनाविल,औदिच्य कार्वे, राव, हेगडे, अयंगर एवं अय्यर आदि कई अन्य उपनामों से पहचाने जाने लगे।ब्रह्मर्षि समाज अपने विभिन्न नामों के साथ भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अभी तक तो अधिकतर कृषि कार्य करते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। (भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है)

Kamlendra Priyadarshi - Admin

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