भूमिहार ब्राह्मण शब्द के प्रचलित होने की कथा

भूमिहार ब्राह्मणों के भूमिपति होने के बहुत से कारक है। भगवान परशुराम ने क्षत्रिय का विनाश कर उनकी भूमि कश्यप आदि ब्राह्मणों को दी थी, यह सर्वविदित है। कुछ ब्राह्मणों को लोकहितकारी सेवाओं के कारण राजवंशो से भूमि अग्रहार के रूप में प्राप्त हुई। प्राचीन काल में कुछ राजवंश ब्राह्मणों के थे। जैसे- शुंग, कण्व, सातवाहन, गुप्त इत्यादि। आज के भूमिहार ब्राह्मणों में से कुछ उन्हीं प्राचीन राजवंशो की परम्परा में है। भूमिहार ब्राह्मणों में चनकिया, सुंगनिया और कण्वायन इन्हीं प्राचीन राजवंशो के अवशेष है। चनकिया चाणक्यवंशी ब्राह्मण हैं, सुंगनिया और कण्वायन का सम्बन्ध् शुंगवंश तथा कण्ववंश से है। ;शंगवंश में पुष्यमित्रा सबसे प्रसिद्व राजा हुए हैद्ध। इस वर्ग में कुछ ऐसे ध्र्माचार्यो के वंशज भी सम्मिलित हैं जो शिक्षण संस्थाओं के संचालन हेतु भूमि ले लेते थे। प्राचीन राजवंशी के उच्च पदाध्किारी, प्रशासक तथा सेनापति भी इस वर्ग में सम्मिलित हुए है। भूमिहार ब्राह्मणों को शताब्दियों की इस ऐसतिहासिक प्रक्रिया से भूमि प्राप्त हुई है। इस वर्ग के अध्किांश लोगो ने अपने बाहुबल और पुरूषार्थ से भुमि अर्जित की है।
First meeting of Bhumihar Brahmin:
भूमिहार ब्राह्मण शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है। सन 1885 में बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने बिहार एवं उत्तर प्रदेश के जमीनदार ब्राह्मणों की सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय संगठन होनी चाहिए। संगठन बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे। परन्तु संगठन का नाम क्या हो इस प्रश्न पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया। मगध् के बाभनों ने जिनके नेता स्वर्गीय कालीचरण सिंह थे, संगठन का नामकरण ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा। स्वयं बनारस महाराज ईश्वरीय प्रसाद सिंह ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ नाम के पक्ष में थे। बैठक में नाम के संबंध् में आम राय नही बन पाई। अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति की अनुशंसा पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ शब्द को स्वीकृत किया गया और इस शब्द का प्रचार-प्रसार करने का निर्णय लिया गया। इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्वर्गीय लंगट सिंह के सहयोग से मुजफ्रपफरपुर में भूमिहार कालेज खोला गया। बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया। आज वही जी.बी.बी. कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्व है।
Bhumihar Brahmin in all over India :
भूमिहार ब्राह्मण एवं इसके समरूप आयाचक ब्राह्मण पूरे भारत में विभिन्न नामों से जाने जाते है। जिसका प्रचार-प्रसार होने से एक-दूसरे में शादी सम्बन्ध् शुरू हो रहा है। पूरे देश के विभिन्न प्रान्तों में अयाचक ब्राह्मण निम्नलिखित नामों से जाने जाते है।
1. बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में- भूमिहार
2. पंजाब एवं हरियाणा में – मोहयाल
3. जम्मू कश्मीर में – पंडित, सप्रू, कौल, नेहरू, दार, काटजू
4. मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश ;आगरा के निकटद्ध-गालव
5. उत्तर प्रदेश में – त्यागी एवं भूमिहार।
6. गुजरात में – अनाविल ;देसाई जोशी, मेहताद्ध
7. महाराष्ट्र में – चितपावन
8. कर्नाटक में – चितपावन
9. पश्चिमी बंगाल – भादुड़ी, चक्रवर्ती, गंगुली, मैत्रा, सान्याल आदि।
10. उड़ीसा में – दास, मिश्र
11. तमिलनाडू में – अÕयर, आयंगर
12. केरल में – नंबूदरीपाद
13. राजस्थान में – बांगर, पुष्कर्ण, पुरोहिती, रंग एवं रूद्र, बागड़ा
14. आन्ध्रप्रदेश में – राव और नियोगी।
ब्रह्मर्षि वंश की ये प्रजातियाँ भले ही देश के विभिन्न प्रान्तो में जा बसी हो लेकिन उनकी संस्कृतिक परम्परा, रीति-रिवाज एवं जन्मजात प्रकृति की दृष्टि में इनमें परस्पर आश्चर्यजनक समानता है, जैसे- त्यााग, बलिदान, निष्ठा, सेवाभाव, देश-प्रेम, कत्र्तव्यप्रियता, शूरता, मेधविता आदि गुण एवं विशेषता समान रूप में व्याप्त है। यही कारण है कि ब्रह्मर्षि वंश की ख्याति देश एवं दुनिया में व्याप्त है।
इन विशेषताओं के अतिरिक्त ब्रह्मर्षियों में मूलभूत समानतायें है, जिसमें दान का परित्याग, कृषि कार्य एवं अन्य व्यवसाय जीविका के आधर, गोत्रों की समानता, परशुराम की उपासकता, प्रशासनिक, शैक्षणिक एवं सैन्य क्षेत्रों में दक्षता तथा शारीरिक संरचना की दृष्टि से भी भूमिहार, त्यागी, मोहयाल, चितापावन एवं दक्षिण भारत सहित सभी अयाचक ब्राह्मणों में आश्चर्यजनक समानता है।

Contributed by : – Kamlendra Priyadarshi , Member of Bhumiharworld

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