भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण ) : bhumihar the royal Community

    Know about Bhumihar Community , the royal Community   ::                           भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण ) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्रहामणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण(बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है भूमिहार, पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, मिश्र ,शुक्ल ,उपाध्यय ,शर्मा,पाठक , ओझा ,झा,दुबे\द्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी ,ठाकुर बिहार में लिखने लगा ज्ञात रहे पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी,पाठक ,मिश्र ,शुक्ल ,उपाध्यय ,शर्मा, ओझा ,दुबे\द्विवेदी इत्यादि सरजूपारियो में भी है औरठाकुर.झा,मिश्र ,पाठक , राय ,सिंह,चौधरी मैथिलों में भी है परन्तु भूमिहारब्राह्मण अपना अलग अस्तित्व रखते है भूमिहार ब्राह्मण पुरोहित भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं।हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। इसी प्रकार और जगह भी कुछ न कुछ यह बात किसी न किसी रूप में पाई गई। हलाकि गया के देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिसा सकद्विपियो को बेचा जा चूका है बनारस राज्य Left: The Maharaja’s Fort (Ramnag front view, 1869. Right: Entrance g fort, 1905. बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा | इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया,हथुवा,टिकारी,तमकुही,लालगोला इत्य ादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे | बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी | 1857 में हथुवा के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेजो के खिलाफ सर्वप्रथम बगावत की (यह दावा अभी विवादस्पद है) | अनापुर राज अमावा राज. बभनगावां राज भरतपुरा धरहरा राज शिवहर मकसुदपुर राज औसानगंज राज नरहन स्टेट जोगनी एस्टेट पर्सागढ़ एस्टेट (छपरा ) गोरिया कोठी एस्टेट (सिवान ) रूपवाली एस्टेट जैतपुर एस्टेट हरदी एस्टेट ऐनखाओं जमींदारी ऐशगंज जमींदारी भेलावर गढ़ आगापुर स्टेट पैनाल गढ़ लट्टा गढ़ कयाल गढ़ रामनगर जमींदारी रोहुआ एस्टेट राजगोला जमींदारी पंडुई राज केवटगामा जमींदारी घोसी एस्टेट परिहंस एस्टेट धरहरा एस्टेट रंधर एस्टेट अनापुर एस्टेट ( इलाहाबाद) चैनपुर मंझा मकसूदपुर रुसी खैरअ मधुबनी नवगढ़ – भूमिहार से सम्बंधित है असुराह एस्टेट कयाल औरंगाबाद में बाबु अमौना तिलकपुर ,शेखपुरा स्टेट जहानाबाद में तुरुक तेलपा स्टेट क्षेओतर गया बारों एस्टेट (इलाहाबाद) पिपरा कोय्ही एस्टेट (मोतिहारी) इत्यादि ये सभी अब इतिहास के गोद में समां चुके है | भूमिहार व्यक्तित्व दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती (जुझौतिया ब्राह्मण,भूमिहार ब्राह्मण,किसान आंदोलन के जनक),बैकुन्ठ शुक्ल (१४ मई १९३४ को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फासी),स्वतन्त्रता सेनानी पंडित बटुकदेव शर्मा, यमुना कर्जी,शील भद्र याजी ,मंगल पांडे १८५७ के क्रांति वीर,कर्यनन्द शर्मा,योगेन्द्र शुक्ल,चंद्रमा सिंह,पंडित राम बिनोद सिंह,राम नंदन मिश्र,यमुना प्रसाद त्रिपाठी, महावीर त्यागी,राज नरायण, रामवृक्ष बेनीपुरी,पं अलगू राय,राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर,राहुल सांस्कृत्यायन,बनारस के राजा चैत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना को धूल चटाई ,देवीपद चौधरी,राज कुमार शुक्ल (चम्पारण आंदोलन कि शुरुवात की),फ़तेह बहादुर शाही हथुवा के राजा १८५७ में अंग्रेजो के खिलाफ सर्व प्रथम विद्रोह किया,काशी नरेश द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कई हज़ार एक्कड का भूमि दान ,योगेंद्र नारायण राय लालगोला(मुर्शिदाबाद) के राजा अपने दान व परोपकारी कार्यो के लिए प्रसिद्ध, इत्यादि महान व्यक्तित्व भूमिहार ब्राह्मण से थे. हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार कुबेरनाथ राय और हिंदी तथा भोजपूरी के वयोवृद्ध लेखक विवेकी राय का अबंध भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से हैं। भूमिहार ब्राह्मण की उत्पति भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है १. एम.ए. शेरिंग ने १८७२ में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Cast में कहा है कि, “भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राहमण हैं
(सैनिक ब्राह्मण)।” २. अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।” ३. पंडित अयोध्या प्रसाद ने अपनी पुस्तक “वप्रोत्तम परिचय” में भूमिहार को- भूमि की माला या शोभा बढ़ाने वाला, अपने महत्वपूर्ण गुणों तथा लोकहितकारी कार्यों से भूमंडल को शुशोभित करने वाला, समाज के हृदयस्थल पर सदा विराजमान- सर्वप्रिय ब्राह्मण कहा है। ४. विद्वान योगेन्द्र नाथ भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक हिन्दू कास्ट & सेक्ट्स में लिखा है की भूमिहार ब्राह्मण की सामाजिक स्थिति का पता उनके नाम से ही लग जाता है, जिसका अर्थ है भूमिग्राही ब्राह्मण। पंडित नागानंद वात्स्यायन द्वारा लिखी गई पुस्तक – ” भूमिहार ब्राह्मण इतिहास के दर्पण में ” ” भूमिहारो का संगठन जाति के रूप में ” भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत,महियल,सरयूपारी ,मैथिल,चितपावन,कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए.मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए. भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है : १. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि. २. सरयू नदी के तट पर बसने वाले से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,आदि. ३. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं.इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर, बहादुरपुर के चौधरी प्रमुख है. (चौधरी, राय, ठाकुर, सिंह मुख्यतः मैथिल ही प्रयोग करते है ) ४. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए.५. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्रह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका,भोजपुर,रोहतास के कई गाँव में ये चित्पवानिया मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं १. सर्वप्रथम १८८५ में ऋषिकुल भूषण काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की. २. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई. ३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई. ४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित ५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की. ६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की. ७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की. ८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया. ९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया. १०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता डा.बी.एस.पूंजे (चित्पावन ब्राह्मण) ने की. ११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस ) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ.और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन पंडित अनंत शास्त्री फडके (चित्पावन ) की अध्यक्षता में हुआ. १२. १९७५ में लक्नाऊ में भूमेश्वर समाज तथा कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना हुई. १३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ. १४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन १५. २३ अक्टूबर १९८४ में गाजीपुर में प्रांतीय भुमेश्वर समाज का अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता श्री मथुरा राय ने की.डा.रघुनाथ सिंह जी ने इस सम्मलेन का उदघाटन किया. १६. १८८९ में अल्लाहाबाद में भूमेश्वर समाज की स्थापना हुई. ” भूमिहार ” शब्द कहा और कबसे अस्तित्व में आया ? भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ” शब्द अस्तित्व में आया.” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है. बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे.परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया.मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे ,सभा का नाम ” बाभन सभा ” करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज “भूमिहार ब्राह्मण सभा ” के पक्ष में थे.बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई,अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई.सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया.इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया.बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया.आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है.भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मन का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है..१५२८ में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहा के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए.इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालक को जन्म दे कर इस लोक से चली गई.इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया.गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए.गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्रह्मण कहलाये .इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा -ड्रोनवार ,गौतम,कान्यकुब्ज,जेथारिया आदि.अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया औरस्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी,आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे,जेथारिया,हीरापुर पण्डे,वेलौचे,मचैया पाण्डे,कुसुमि तेवरी,ब्र्हम्पुर िये ,दीक्षित ,जुझौतिया ,आदि भूमिहार ब्राह्मण (सरयू नदी के तट पर बसने वाले ) पिपरा के मिसिर ,सोहगौरा के तिवारी ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी ,माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी ,गाना के मिश्र ,मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी ,आदि.भूमिहार ब्राह्मन में हैं. ” वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए भूमिहार लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं सामाजिक जीवन भूमिहारो में आपसी भाईचारा और एकता होती है। भूमिहार अंतर्विवाही है और जाती में ही विवाह करते है। पहले वर्ष के अंत में माता काली की पूजा करना, गरीबों और शरणागतों को भोजन करना और वस्त्र बाटना भूमिहारो के बहुत से गावों में एक प्रथा थी। भूमिहार को भूमि दान में मिलती थी। और स्वयं भी तलवार के दम पर भूमिहारो ने भूमि अर्जित की है। कृषि कर्म भूमिहारो का पेशा था। आज भूमिहार हर क्षेत्र में अग्रणीय है। ब्राह्मण होने के कारण भूमिहार स्वयं हल नहीं जोतते है।

————————— Contributed by Bidyanand Mishra ( Member of Bhumiharworld FB Group )

2 comments on “भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण ) : bhumihar the royal Community”

  1. ashutosh singh ashutosh singh

    Bhumihar (भूमिहार) or Babhan (बाभन) is a land holding community found mainly in Eastern UP, Bihar and Jharkhand. Bhumihar or Bhumik (Bhowmika) was the word used in Indian feudal system to denote landlord before the introduction of Persian word Zamindar by Mughals and other Muslim rulers. Bhumihar literally means possessor of land or land holder (bhoomi + haar ) similar to word Bhumik(Bhowmik). Bhoomi word was used in the past feudal system to denote grant of land for secular services. The holder of such bhoomi was a Bhumihar. Bhumihar word is Hindustani (Indian) equivalent to the Persian word Zamindar or Jagirdar. If a Brahmin had land grant for secular services was called Bhumihar Brahmin . If a Kashtriya had such grant was called Bhumihar Kashtriya [1]. These Bhumihars generally used Rai, Singh, Shahi, Thakur or Chaudhury as their surnames to denote their power and authority with land. Bhumihar was not any caste specific word in earlier times just like Zamindar or Jagirdar or Thakur or Chaudhury, It was merely a position of land lordship in the society. It has become a caste specific word purely after it’s popularization by Kashi Naresh and Bhumihar Brahmin Sabha (Caste assembly of Babhans led by Kashi Naresh) for a land owning Babhan community. Babhan was the earlier name of community who owned large chunk of land in Bihar (including Jharkhand ) and Kashi during British period so were called Bhumihar (possessor of land). Rajputs were also land possessor but they were more commonly known as Thakur. Bhumihar or Babhan community of today were enumerated as Babhan only in earlier British census Records under military and aristocratic class just like Taga (Tyagi) (census of India 1901, census of India 1891,Census of India 1881 and census of Bengal 1872). There were some myths fabricated by some orthodox people regarding Babhan caste as fallen Brahmin just like Raut means fallen Rajput[2,a,b]. This kind of insinuation and false propaganda by some orthodox people led Kashi Naresh and other Babhan landlords to establish a caste Sabha in 1885 which was later called as Bhumihar Brahmin Sabha. Babhan community always disregard the fallen Brahmin myth and consider themselves to be pure Brahmins who has taken up land grant by lord Parsuram, so were called bhumihar or bhuinhar (land taker or land holder ). Big landlords or rajah (especially Kashi Naresh) were the main proponent of Bhumihar word over old babhan term mainly to cast their land ownership state. Bhumihar Brahmin sabha filed numerous representations with E. A. Gait, the director of census operations for Bengal and Bihar, which argued that, for the purposes of the census, the term “Babhan” should not be used to describe them and instead they should be called as Bhumihar or landed Brahmans[3]. In this way after 1921 census survey Babhans were enumerated as Babhan ( Bhumihar Brahmin) in census record. Now a day the same Bhumihar term is used as shortened version of Bhumihar Brahmin. The old Babhan name of community has become just part of history found mainly in all gazette and non gazette documents at the time of British era. It is also popular in the villages of Magadh (South Bihar) were still Babhan is more frequently used over Bhumihar term in local conversation. Collages and Schools were opened with name Bhumihar Brahmin collage (presently Langat singh collage )and Bhumihar collegiate schools to popularize this Bhumihar term over old Babhan name. Bhumihar was merely a title or status of some members of Babhan community, since they were proprietor of large estates at the time of British. Now it has become the main name after popularization by Bhumihar Brahmin sabha led by big landlords or rajah.
    Babhan word is found in ashokan edicts in reference to Brahmins of Magadh. This led many scholars associate Babhans with Buddhism but there is not any substantial evidence of such association.[4]
    Risley had a hypothesis, that is Babhans are offshoot of Rajputs,since Babhans have territorial division along with Brahmanical Gotras, which he thought only present among Rajputs[2]. Yogendra nath bhattacharya has pointed out similar kind of territorial division (called dih) and Brahmanical Gotras exist in Maithili brahmins and Sarshwat brahmins that means they are also offshoot of Rajputs. So his hypothesis was entirely wrong and baseless [1].
    The most likely explanation about origin of this community is given in book [Indo-Aryan races, A study of the origin of Indo-Aryan people and institutions by Chanda, Ramaprasad] [4]. This clearly tells Bhumihar Brahmin or Babhan to be Brahmins of ancient Magadh who were speaking a dialect of 3rd century BC(at the time of ashoka) in which Brahmins were known to be Babhans or Bambhans. They have been deprived of priestly function by Sanskrit speaking Brahmins from midland(central & north India). Many Brahmin dynasty flourished in Magadh like Kanva dynasty , Shunga dynasty. This is a clear testimony of Brahmins taking up land duties since ancient times in Magadh. These non priestly Brahmins certainly have been more popularly known by their native name Babhan. Fa Hian, the Chinese traveler has written about brahmins of magadh becoming land masters instead of being knowledge master.
    Many people from other brahmin communities like sarvariya and kanyakubj Brahmin, Muhyal Brahmin (Hussaini Brahmin), Kokanastha Brahmin (chitponiya babhan) has merged with babhan community and become part of it. Kannojia and sarvaria clan of babhans ( bhuinhar brahmins) are mentioned in a book by Mr sherring [5]
    Entire census record as well as gazetteer of districts and ethnographic study at the time of British have shown Babhan as a synonym to Bhuinhar or Bhumihar Brahmin.At the time of british there was a confusion regarding bhuinhar (distorted colloquial of bhumihar) word, since it was synonym for Babhan as well as title for some Tribals(since some of them possess land) in chota nagpur[6].
    Babhans have been termed as military Brahmins by Francis Buchanan in his journal of patna and gaya during 1811 to 1812. He was the first person of recent times to write regarding this community.
    Recently i came to know that Bhumihar perhaps be the short of bhumi agrahar. That is the land grant given to Brahmans for religious activities. Hindu kings were known for agraharan to learned brahmins. This title to babhan community is perhaps because of agraharam given to them in the form of bhumi or village. The village or place allotted to them would be the name of their territorial clan like Marre babhan or Sonbhadariya babhan. I do not have much supporting documents to above said statement.
    some of important citation given below. The above content is taken from these books only.
    [1] Hindu Castes and Sects: An Exposition of the Origin of the Hindu Caste by Jogendra Nath Bhattacharya
    Hindu Castes and Sects: An Exposition of the Origin of the Hindu Caste … : Jogendra Nath Bhattacharya : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/hinducastesands00bhatgoog/page/n132)
    [2,a] The Tribes And Castes Of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 1 By Risley, Herbert Hope, Sir,
    The Tribes And Castes Of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 1 : Risley, Herbert Hope, Sir, 1851-1911 : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/TheTribesAndCastesOfBengal/page/n139)
    [2,b] Census Of India 1901 Vol.1 (india ) (ethnographic Appendices) By Risley, Herbert Hope, Sir,
    Census Of India 1901 Vol.1 (india ) (ethnographic Appendices) : Risley, H.h. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55922/page/n199)
    [3]Peasants and Monks in British India by William R. Pinch
    Peasants and Monks in British India (https://publishing.cdlib.org/ucpressebooks/view?docId=ft22900465&chunk.id=s1.3.13&toc.id=ch3&toc.depth=1&brand=ucpress&anchor.id=d0e4900#X)
    [4] Indo-Aryan races: a study of the origin of Indo-Aryan people and institutions : Chanda, Ramaprasad
    Indo-Aryan races: a study of the origin of Indo-Aryan people and institutions : Chanda, Ramaprasad : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/Indo-aryanRacesAStudyOfTheOriginOfIndo-aryanPeopleAndInstitutions/page/n173)
    [5] Hindu Tribes and castes
    Hindu Tribes And Castes Vol 1 : Sherring : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.469749/page/n63)
    [6] Census of india 1901, Census of India, 1901 : India. Census Commissioner : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n405)
    [7] Refer Census of India from 1872 -1881–1891–1901–1911–1921–1931–1941. These census and ethnographic study by Indian and British historians and officers clearly tells about all the castes in India.

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