भूमिहार ब्राह्मण उत्तम ब्राह्मण

भूमिहार को ब्राह्मण कहने पर जो आपत्ति करते हैं पढ़ ले

अयोध्या जी में पुराना ‘आनन्द भवन’ नामक एक मठ है, जिसकी स्थापना भूमिहार ब्राह्मण कुल में उत्पन्न एक विरक्त महात्मा ने की थी। उस मठ के महंथ ‘सियावर शरण’ अपना उत्तराधिकारी घोषित किए बिना ही साकेतवासी हो गए। अस्तु, उनके भंडारे में उपस्थित संत-महंथों ने परम्परा के अनुसार उनके शिष्य ‘महावीर शरण’ को चादर दे कर महंथ घोषित किया। ‘आनन्द भवन’ की भूसंपत्ति फैजाबाद जिले के बीकापुर विकास प्रखण्ड भीतर ‘मंझनपुर’ ग्राम में पड़ती है। वहाँ का एक लोभी व्यक्ति मठ की कुछ भूमि हथियाना चाहता था। महंथ महावीर शरण के रहते इसकी संभावना न देख उसने एक कठपुतली वैरागी संत नामधारी ‘राम दुलारे शरण’ के द्वारा अदालत में ‘श्री महावीर शरण’ की महंथी को चुनौती देते हुए यह दावा कराया कि महंथ ‘सियावर शरण’ का भंडारा मैंने किया था और संत-महंथों ने आनन्द भवन का महंथ मुझे चुना है। उनका यह भी कहना था कि आनन्द भवन मठ का महंथ वसीयतनामे के अनुसार वही हो सकता है जो विरक्त वैरागी तथा ब्राह्मण हो। महावीर शरण भूमिहार है, इसलिए मठ का महंथ होने के योग्य नहीं है। क्योंकि भूमिहार ब्राह्मण नहीं होते। उन्होंने मठ पर अवैध अधिकार कर लिया है। उन्हें वहाँ से हटा दिया जावे। किंतु सब-जज श्री रामकुमार सक्सेना ने मूल वाद संख्या 22 सन 1962 में 31-3-64 को अपने पारित निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा कि महावीर शरण भूमिहार ब्राह्मण है और उनकी शपथ के अनुसार मैं यह मानता हूँ कि उनकी जाति ब्राह्मण मानी जाती है। मैं उन्हें ब्राह्मण मानता हूँ और वे अहदनामे के अनुसार मन्दिर के सरबराहकार बनने के लिए सर्वथा योग्य है। महावीर शरण सियावर शरण के पुराने चेला है। निर्माणकर्ता द्वारा निर्मित सभी योग्यताएँ महावीर शरण में विराजमान है। अत: मैं रामदुलारे शरण का दावा खारिज करता हूँ।

इसके बाद रामदुलारे शरण ने दूसरी अपील की। तत्कालीन जिला जज श्री आर.पी. दीक्षित ने पुनर्विचार के लिए मुकदमे को उसी न्यायपीठ में लौटा दिया। उस समय श्री सक्सेना साहब का स्थानांतरण हो चुका था और उनकी जगह पर श्री जी.डी. चतुर्वेदी आ चुके थे। उन्होंने बिना सोचे-समझे अपने निर्णय में लिखा कि भूमिहार लोग ब्राह्मण नहीं होते और उस वंश से संबंधित महाराज बनारस, महाराज हथुआ और महाराज तमकुही भी ब्राह्मण नहीं है।

तत्पश्चात् कुछ विद्वानों एवं सन्तों ने महावीर शरण की ओर से जी.डी. चतुर्वेदी महोदय के निर्णय के प्रतिकूल जिला जज के पास अपील दाखिल किया।

जज साहब ने पुन: सुनवाई के लिए मुकदमे को एडिशनल जिला जज, ‘श्री एस.ए. अब्बासी’ महोदय की न्यायपीठ में भेज दिया। विद्वान, अनुभवी और कुशाग्र बुद्धिवाले न्यायमूर्ति ‘अब्बासी’ महोदय ने पुन: नए सिरे से अभियोग का परीक्षण किया और बड़े मनोयोग से ग्रन्थों तथा अभिलेखों का अध्यायन एवं गवाहियाँ लीं। सारे परीक्षण के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे कि ‘भूमिहार ब्राह्मण उत्तम ब्राह्मण’ हैं इस प्रकार उक्त मुकदमे में महंत महाराज महावीर शरण की विजय हुई।

इसके बाद विपक्ष की ओर से जिला जज, फैजाबाद के यहाँ अपील की गई। किंतु एडिशनल (अतिरिक्त जज) (न्यायाधीश ने अब्बासी महोदय के फैसले को बरकरार रखा। तब अन्त में विपक्ष की ओर से उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ में अपील की गई। किंतु उच्च न्यायालय ने भी नीचे के न्यायाधीशों के फैसलों को पूर्ण समर्थन के साथ बहाल रखा।

Leave A Reply