आरक्षण के दुष्प्रभाव

“आरक्षण के दुष्प्रभाव” —  मनीष कुमार चौधरी

आरक्षित वर्ग के धनाढ्य परिवारों के बच्चे कम योग्यता के बावजूद भी धड़ल्ले से प्रवेश पा रहे हैं, जिसका सीधा असर दक्षता एवं कार्यकुशलता पर पड़ रहा है। यूं भी कहा जा सकता है कि ‘आरक्षण के सामने प्रतिस्पर्धा हो रही लाचार, जुगनू तो अधिकारी बना और सूरज बना चौकीदार’… भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्ष और जातिविहीन समाज की कल्पना की गई है। भारतीय संविधान हर भारतीय नागरिक
को जाति, लिंग और धर्म भेद के बिना समानता का मूल अधिकार प्रदान करता है। वैसे भी आरक्षण की नीति सामाजिक न्याय और समानता के अधिकार के विपरीत है। हमारे नेताओं में जातिगत आधार पर मात्र 10 वर्षों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी, परंतु आज 64 वर्षों के बाद भी जातिगत आरक्षण समाप्त नहीं किया जा रहा है। आरक्षण का लाभ धनी आरक्षित परिवार ही पीढ़ी दर पीढ़ी ले रहे हैं, लेकिन गरीब
परिवारों को आरक्षण का लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। पं जवाहर लाल नेहरू ने 27 जून, 1961 को प्रधानमंत्री के रूप में मुख्यमंत्रियों को पत्र
लिखा था कि ‘जातिगत आरक्षण के रास्ते चलना मूर्खता ही नहीं विध्वंसकारी है’। परंतु न जाने आज भी धनी आरक्षित वर्ग की मानसिकता इतनी संकीर्ण क्यों है कि उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात हजम नहीं हो रही है। आज पूरा देश जातिगत आरक्षण रूपी कैंसर से पीडि़त है। जातिगत आरक्षण देश को जातीय संघर्ष की ओर धकेलने वाला और समानता के मूल अधिकार को छीनने वाला है। अनारक्षित वर्ग के बच्चे बहुत अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद आरक्षण के दुष्प्रभाव के कारण व्यावसायिक शिक्षा में प्रवेश पाने एवं प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। इसके विपरीत आरक्षित वर्ग के धनाढ्य परिवारों के बच्चे कम योग्यता के बावजूद भी धड़ल्ले से प्रवेश पा रहे हैं, जिसका सीधा असर दक्षता एवं कार्यकुशलता पर पड़ रहा है। यूं भी कहा जा सकता है कि ‘आरक्षण के सामने प्रतिस्पर्धा हो रही लाचार, जुगनू तो अधिकारी बना और सूरज बना चौकीदार’ वैसे तो अब पूरी तरह से आरक्षण समाप्त किया जाना चाहिए, फिर भी यदि आरक्षण जारी रखना ही है, तो आर्थिक आधार ही आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसके पीछे पहला तर्क यह है कि उच्च राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर आसीन लोगों को जाति के आधार पर पिछडे़ वर्ग को मिलने वाला लाभ दिया जाना उचित नहीं है। क्योंकि उच्च पदों पर
आसीन पिछड़े वर्ग के लोगों को वास्तव में आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं है। वे वंचित वर्ग के अन्य लोगों तक इस सुविधा का लाभ
नहीं पहुंचने देते। इससे आरक्षण की सार्थकता जाती रहती है। दूसरा तर्क यह है कि अगड़ी जातियों के गरीब और साधनहीन लोग
भी उतने ही विवश हैं, जितने कि पिछड़े वर्ग के लोग, फिर केवल अगड़ी जाति से संबंधित होने के कारण उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित

मनीष कुमार चौधरी

मनीष कुमार चौधरी

नहीं रखा जा सकता है। जहां तक छुआछूत तथा जाति भेदभाव का प्रश्न है, नई पीढ़ी को इसमें कोई रुचि नहीं है। आर्थिक आधार पर आरक्षण
की मांग ब्राह्मण सभा, आरक्षण विरोधी पार्टी, राजपूत सभा, सामान्य वर्ग, कर्मचारी कल्याण महासंघ, समता आंदोलन और अखिल
भारतीय समानता मंच इत्यादि संगठन काफी लंबे अरसे से उठा रहे हैं। 4 फरवरी, 2014 को कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी से जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग इस तर्क के आधार पर की थी कि गरीब की कोई जाति नहीं होती है। वह सिर्फ गरीब होता है। परंतु इसके विपरीत उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को निजी क्षेत्र में भी आरक्षण का लाभ देने के वादे को घोषणा पत्र में शामिल कर दिया है। 85वें संविधान संशोधन के अंतर्गत माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई व्यवस्था को प्रभावहीन करने तथा बाधारहित आरक्षण प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लाया गया 117वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में विचाराधीन है। राज्य सभा में जब यह विधेयक बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती की महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु पेश किया गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब तक अनारक्षित वर्ग अपनी एकजुटता का परिचय नहीं देगा, तब तक राजनेता जातिगत आरक्षण के नाम पर रोटियां सेंकते रहेंगे। यह एक चिंतनीय विषय है कि आरक्षण रूपी कैंसर से समाज को किस तरह निजात दिलाई जाए। इसके अतिरिक्त यदि निजी क्षेत्र में भी प्रतिभा को नकारते हुए आरक्षण का प्रावधान कर दिया जाता है, तो अनारक्षित वर्ग की पीढ़ी का भविष्य
असुरक्षित हो जाएगा।

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